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संस्था के काम के बरस
संस्था · अमरगंज चरखारी · स्थापित 1994
बुन्देलखण्ड विकास सेवा आश्रम 1994 से काम कर रही है, अमरगंज चरखारी में आरंभ, अब उरई में। बुन्देलखण्ड के गांवों के साथ पाँच क्षेत्रों में काम, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिलाओं की आजीविका, युवा संस्कृति, और महर्षि वाग्भट्ट योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा।
संस्था एक दृष्टि में
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संस्था के काम के बरस
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संस्था के मुख्य खंभे
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उत्तर प्रदेश के जिले, जहां संस्था का सबसे अधिक काम है
1994
स्थापना वर्ष, अमरगंज चरखारी
संस्था कहां काम करती है
संस्था की जमीनी पकड़ बुन्देलखण्ड के यूपी वाले सात जिलों में सबसे गहरी है। इन्हीं जिलों में 1994 से हमारे कार्यकर्ता, समूह और साझेदारियां बनी हैं। हर जिले के मिजाज के हिसाब से काम अलग ढंग से उतरता है।
संस्था के पाँच खंभे
संस्था पहले दिन से यही मानती आई है, गांव की कोई समस्या कभी अकेली नहीं होती। पढ़ाई कमजोर हो तो स्वास्थ्य भी पिछड़ती है, महिलाओं के समूह ठंडे पड़ जाएं तो बच्चों की आवाज भी दब जाती है। इसीलिए हम पाँचों खंभों को एक साथ रखते हैं, और रोग आने से पहले उसे रोकने वाले योग और प्राकृतिक चिकित्सा को भी उसी कतार में।
स्कूल छूट चुके बच्चों को ढूंढकर वापस पढ़ाई से जोड़ना, किताब-कॉपी की मूलभूत सहायता, और युवाओं को स्कूल के बाद की राह समझाना। असली पढ़ाई हमें वहीं दिखती है, जहां बच्चा क्लास में डरता नहीं है।
गांव में जांच शिविर, महिला और किशोरी के स्वास्थ्य पर खुली बात, पोषण की समझ, और जब आवश्यकता पड़े तो परिवार को सही अस्पताल तक पहुंचाना। जांच करवाकर हाथ झाड़ लेना हमारी विधि नहीं है।
स्वयं सहायता समूह, छोटी बचत, स्थानीय कौशल, और घर के पास से आरंभ हो सकने वाला काम। पैसा जब महिला के हाथ में आता है, बच्चे की थाली पहले बदलती है, फिर गांव की बैठक का माहौल।
आल्हा, दिवारी, कजरी, राई और गांव की बैठकें केवल आयोजन नहीं हैं। इन्हीं से समाज एक साथ रहता है। युवाओं को हम इसी संस्कृति के भीतर उत्तरदायित्व सौंपते हैं, उससे अलग करके नहीं।
संस्था के सह-संस्थापक श्री रमेश चन्द्र द्विवेदी ने 2005 में उरई से ‘योग क्रांति’ आरंभ की थी। आज यह पहल उसी बीस वर्षों के परिश्रम पर टिकी है। योग, प्राणायाम, प्राकृतिक चिकित्सा, आहार-विहार और ऋतुचर्या, सब एक साथ। महर्षि वाग्भट्ट के अष्टांगहृदय की बात को आज की भाषा में लाकर हम गांवों में योग शिविर, प्राकृतिक उपचार सत्र और जीवनशैली पर बैठकें करते हैं।
संस्थान और सात दिन का कार्यक्रम देखेंहम यहां क्यों
संस्था उरई में इसलिए आरंभ हुई क्योंकि वहीं संस्थापकों ने गांव का हाल पास से देखा। बुन्देलखण्ड के पत्थर, पानी, सूखा, पलायन, आल्हा और बुन्देली बोली, इन सबको समझकर ही हमारा काम बनता है।
संस्था के मैदान से
ये कहानियां संस्था की डायरियों, बैठकों और महिला कार्यकर्ताओं के अनुभवों से निकली हैं। एक पढ़ाई की, एक समूह की बचत की, और एक उस मिट्टी की जिस पर हमारा सारा काम खड़ा है।
एक लंबी कहानी, जहां कक्षा की भित्ति ही सबसे बड़ा प्रश्न थी। बुन्देलखण्ड के एक परिवार और एक कार्यकर्ता के साथ बिताए कुछ दिन।
पढ़ेंजब महिला की हथेली में पहली बार पांच सौ आए, तो घर में क्या बदला, क्या अब भी नहीं बदला। खुली बातचीत के साथ एक लंबी कहानी।
पढ़ेंबुन्देलखण्ड की पहचान केवल खेत तक नहीं है। यह लेख उस क्षेत्र की बात करता है जहां से संस्था का काम आरंभ हुआ।
पढ़ेंसंस्था के साथ
आप स्वयंसेवा करना चाहें, संस्था से साझेदारी बनाना चाहें, या अध्ययन के लिए गांव आना चाहें, हम सुनने को तैयार हैं।