कहानी · महिला आजीविका
समूह की बचत और रसोई की थाली
जिस परिवार में महिला की पहली कमाई ने दस्तक दी, वहां थाली में क्या बदला, और बैठक में उसकी कुर्सी की जगह कितनी बदली। एक स्वयं सहायता समूह की भीतर से देखी गई कहानी।
महोबा के एक गांव में बारह महिलाओं का समूह। पहले महीने की बचत पचास रुपए प्रति सदस्य। छह सौ कुल। पहला बैंक खाता खुलवाने में तीन महीने लगे। आधार, दस्तखत, पासबुक, जमा पर्ची। हर कदम पर कोई एक महिला दूसरे के हाथ से उंगली पकड़कर चली।
समूह की एक सदस्य, मान लीजिए सीमा, घर में सिलाई जानती थीं पर मशीन नहीं थी। दो साल की बचत और समूह से कम ब्याज पर दो हजार का कर्ज, यही पूरा प्लान था। मशीन आई। पहले अपने बच्चों के कपड़े। फिर पड़ोसी के। फिर एक छोटी दुकान से ऑर्डर। महीने का तीन से चार हजार।
पहली बार जब मेरे नाम का कोई नोट था, जो अपना था, तो मैंने उसे तह करके आटे के डिब्बे में रखा। उसी डिब्बे में, जहां से रोज रोटी निकलती थी। मैं चाहती थी कि यह नोट भी उसी हिस्से में रहे। एक समूह सदस्य, महोबा
थाली में क्या बदला
पहले थाली में रोटी और दाल थी। कभी-कभी एक सब्जी। कमाई के तीसरे महीने बाद सीमा ने बच्चों के लिए हर दूसरे दिन दूध लेना शुरू किया। चौथे महीने हरी सब्जी दो बार हफ्ते में। छठे महीने बच्चे की ट्यूशन की फीस जो पहले टलती थी, वो समय पर जमा हुई। यह बदलाव छोटा लगता है। यह छोटा नहीं है।
बैठक में कुर्सी
गांव की बैठक अक्सर पुरुषों की होती है। पहले समूह की महिलाएं बैठक के दूर कोने में खड़ी होकर सुनतीं। एक साल बाद समूह ने संस्था के साथ मिलकर तय किया कि महीने की एक बैठक केवल समूह के मुद्दों पर होगी। स्कूल का नाम रहे, राशन कार्ड में महिला का नाम जुड़े, आंगनबाड़ी की सप्ताहिक रिपोर्ट समूह के सामने आए।
पहले छह महीने बैठक में पुरुष नाराज़ थे। फिर सीमा के पति, जिनकी खेत की आमदनी भी घर के खर्च में जाती थी, उन्होंने खुद कहा कि अब जब सीमा की कमाई घर की थाली बदल रही है, तो उसकी बात भी सुननी होगी। यह बदलाव किसी कार्यशाला से नहीं आया। यह एक सिलाई मशीन से और दस हजार रुपए की साल की बचत से आया।
समूह टिकाए रखना, यही सबसे कठिन
समूह शुरू होना आसान है। समूह चलते रहना, और छह-सात साल बाद भी एक ही कुर्सी पर बैठी वही बारह महिलाएं पासबुक लेकर आ जाएं, यह कठिन है। इसीलिए हमारा काम शुरुआती तीन साल नहीं, बाद के पांच साल में ज्यादा दिखता है।
हम समूह में जुड़कर हिसाब-किताब नहीं चलाते। वो महिलाएं खुद चलाती हैं। हम बस यह देखते हैं कि बैठक छूटे नहीं, कोई सदस्य अकेली न रह जाए, और कर्ज लौटाने के दबाव में समूह का रिश्ता न टूटे।
टिप्पणी: सीमा का नाम बदला गया है। यह कहानी बुन्देलखण्ड के कई महिला समूहों के अनुभव से बनी है।