कहानी · बुन्देलखण्ड

पत्थर, पानी, आल्हा और हम

यह कहानी किसी एक व्यक्ति की नहीं है। यह जमीन की है, बेतवा की है, आल्हा की है, और उस जुड़ाव की है जो पलायन के बावजूद टूटता नहीं।

बुन्देलखण्ड में सबसे पहले पत्थर मिलता है। फिर मिट्टी। हर खेत के नीचे कहीं न कहीं एक चट्टान है जो याद दिलाती रहती है कि यहां जमीन आसान नहीं है। गर्मी में पानी नीचे जाता है। मानसून में मिट्टी बहती है। फिर भी यहां गेहूं, चना, तिल, सरसों, और मूंगफली की खुशबू उठती है। यही बुन्देलखण्ड का ज़िद्दी स्वभाव है।

बेतवा, केन, धसान, और नदियों के नाम

बेतवा पश्चिम से आती है, और अपने किनारों पर ओरछा, झांसी, हमीरपुर जैसे नाम छोड़ती चलती है। केन बांदा और चित्रकूट के बीच एक पुरानी बातचीत की तरह बहती है। धसान बीच से निकलती है, और गर्मी में पतली हो जाती है जैसे थक गई हो। यमुना उत्तर की सरहद खींचती है। ये नदियां गांवों को शहर से नहीं जोड़तीं। ये गांव को गांव से जोड़ती हैं।

पानी कम हो या ज्यादा, बुन्देलखण्ड के गीत कम नहीं पड़ते। यही जमीन की असली संपत्ति है। एक बुजुर्ग, महोबा

आल्हा, जो ज़बान में अब भी जिंदा है

आल्हा कोई मनोरंजन नहीं है। यह एक गाथा है जो बारहवीं सदी की एक लड़ाई को आज के गांव तक उठाकर ले आती है। इसमें उदल और आल्हा हैं, माहिल की चतुराई है, ब्रह्मानंद की ज़बान है, और मलवा के राजा पृथ्वीराज की चुनौती है। जब कोई बुजुर्ग आंगन में बैठकर आल्हा शुरू करता है, तो वो बच्चा जो दिल्ली जाने की सोच रहा था, उसे एक पल के लिए रुक जाना पड़ता है। यह रुकावट छोटी नहीं है।

बारह बरस लौ कूकर जीएँ, अरु तेरह लौ जीएँ सियार।
बरस अठारह क्षत्री जीएँ, आगे जीवन कौ धिक्कार।।
जगनिक, आल्हाखण्ड की प्रसिद्ध शुरुआत

ये पंक्तियां आज भी महोबा से लेकर चित्रकूट तक बुज़ुर्गों के होठों पर हैं। कहानी आगे बढ़ती है, पर यह पहली तस्वीर लंबी टिकती है। जिस देश में बुज़ुर्ग इतनी खुद्दारी से बोलें, वहां गांव बहुत कुछ झेलकर भी अपनी पहचान नहीं छोड़ता।

और आल्हा अकेला नहीं है। ओरछा के केशवदास ने रामचन्द्रिका लिखी, पद्माकर ने जगद्विनोद, और टीकमगढ़ के ईसुरी ने फाग को अमर बना दिया। बुन्देलखण्ड की ज़बान इन कविताओं से लगातार पानी पाती रही है।

पलायन, और वो धागा जो नहीं टूटता

बुन्देलखण्ड से लोग गए हैं। दिल्ली, कानपुर, मुंबई, सूरत, लुधियाना। पर जाने वालों में से अधिकतर होली पर लौटते हैं। कुछ दीवारी पर। कुछ नौरात पर। जब गांव में कोई शादी हो, तो बाईस-बाईस घण्टे की बस यात्रा के बाद भी दरवाजा खटखटाते हैं। यह जुड़ाव उन्हें किसी एनजीओ ने नहीं दिया। यह उन्हें जमीन ने दिया।

हमारे काम का आधार यही धागा है। जब हम कहते हैं कि गांव पहले, तो इसका मतलब यह नहीं कि गांव को बाहर से काट दो। इसका मतलब यह है कि जो भी बाहर गया है, उसकी वापसी के लिए एक जगह बचाकर रखो। वो जगह स्कूल हो, समूह हो, बैठक हो, या सिर्फ आल्हा की एक शाम।

इसलिए काम

संस्था यूपी के सात जिलों में गहरी है और बुन्देलखण्ड के 22 जिलों के रिश्ते में बंधी है। यहां शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला आजीविका, और युवा संस्कृति पर जो कुछ किया जाता है, वो सब इसी भूगोल को समझकर किया जाता है। पत्थर को, पानी को, आल्हा को, और वापसी के उस धागे को।

यह एक निबंध है, किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं। इसमें जो आवाजें हैं, वो बुन्देलखण्ड के कई गांवों में सुनी गई हैं।

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