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बरसों का लगातार साथ
प्रभाव · 1994 से आज तक
1994 से आज तक संस्था के तीस साल का काम। बुन्देलखण्ड के सात जिलों में क्या बदला, और कौन सा काम अभी बाकी है।
एक दृष्टि में
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बरसों का लगातार साथ
22
बुन्देलखण्ड के जिले, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश
5
आपस में जुड़े खंभे
1994
स्थापना वर्ष, अमरगंज चरखारी
ये आंकड़े दिखावे के लिए नहीं हैं। बस इतना बताते हैं कि हम लंबे समय तक टिककर काम करने में विश्वास करते हैं। जब काम गहरा हो, तो गिनती हमेशा कम ही बताती है।
दिखने वाला बदलाव
छूटे बच्चे वापस कक्षा में, मां-बाप का स्कूल तक आना-जाना, और घर में यह सोच कि पढ़ाई छुड़ाने से पहले एक बार सोच लें। बात छोटी दिखती है, प्रभाव बड़ा होता है।
समूह चलता रहा, तो बचत भी चलती रही, और धीरे-धीरे बड़े निर्णयों में महिलाओं का मत पहुंचने लगा। यह पांच साल की बात नहीं, दस-पंद्रह साल की बात है।
जिन परिवारों ने पहले शहर का अस्पताल नहीं देखा था, वे समय रहते सहायता लेने लगे। कागज और मार्ग, दोनों का डर कम हुआ।
मील के पत्थर
श्री रामगोपाल द्विवेदी और श्रीमती यशोदा द्विवेदी ने हमीरपुर जिले के गहरौली गांव से सामाजिक काम का आरंभ किया। यहीं श्री रमेश चन्द्र द्विवेदी का जन्म भी हुआ। गहरौली पुराने जमाने से क्षेत्र के सबसे बड़े गांवों में गिना जाता है।
श्री रामगोपाल द्विवेदी परिवार सहित गहरौली से चरखारी (महोबा) आ गए, जहां उन्होंने चरखारी के ब्लॉक/तहसील कार्यालय में वरिष्ठ लेखाकार के पद पर सेवा दी।
विरासत में मिले इसी काम को श्री रमेश चन्द्र द्विवेदी ने सोसायटी का रूप दिया। ‘बुन्देलखण्ड विकास सेवा आश्रम’ का पंजीकरण अमर गंज चरखारी (तब हमीरपुर, अब महोबा) से हुआ। पंजीकरण संख्या J-7896। पहला ध्यान स्कूल से जुड़ाव और परिवार में बातचीत पर रहा।
श्री रमेश चन्द्र द्विवेदी की श्रम विभाग की सेवा उरई में थी। संस्था और परिवार धीरे-धीरे उरई में बस गए, और संस्था का नवीनीकरण उरई, जिला जालौन से हुआ।
छूटे बच्चों को पढ़ाई से वापस जोड़ने की विधि बनी। बुन्देलखण्ड के और गांव साथ जुड़ते गए।
जालौन, हमीरपुर और बांदा में महिला स्वयं सहायता समूहों का जाल बना। बचत, छोटे काम-धंधे और बहुतों के लिए पहली बार बैंक खाता।
श्री रमेश चन्द्र द्विवेदी की अगुवाई में उरई से ‘योग क्रांति’ आरंभ हुई। यही आगे चलकर महर्षि वाग्भट्ट योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा की नींव बनी।
स्वास्थ्य की समझ, पोषण और किशोरियों से बातचीत पर काम सुदृढ़ हुआ। ललितपुर और चित्रकूट में नए गांव जुड़े।
श्री रमेश चन्द्र द्विवेदी 40 साल की सेवा के बाद वरिष्ठ श्रम प्रवर्तन अधिकारी (Senior Labour Enforcement Officer) पद से सेवानिवृत्त हुए। इसी साल से वे संस्था का सारा काम पूरे समय देखने लगे।
महामारी के साल। फोन पर बातचीत, घर तक पहुंच, राशन की सहायता और स्वास्थ्य की मूलभूत सूचना पर पूरा जोर रहा।
युवाओं की भागीदारी, गांव में बैठक-चौपालें, और बुन्देली संस्कृति को काम का हिस्सा बनाने का नया प्रयास।
उरई में महर्षि वाग्भट्ट योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा संस्थान का विधिवत शुभारंभ। संचालक श्री रमेश चन्द्र द्विवेदी। सात दिन का आवासीय कार्यक्रम, बाहर से आने वालों के लिए भोजन और ठहरने की व्यवस्था।
सातों जिलों में पाँचों खंभों पर काम चल रहा है, शिक्षा से लेकर महर्षि वाग्भट्ट योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा तक। पहले की भांति, कागज बाद में, गांव पहले।
जिलेवार तस्वीर
जालौन
जालौन में स्कूल से जुड़ाव, महिला समूह और परिवार के स्वास्थ्य पर लगातार काम चलता है। यहीं से संस्था के काम की विधि बनी।
झांसी
यहां पढ़ाई और स्वास्थ्य एक ही बातचीत में साथ-साथ आए। युवाओं की भागीदारी के आरंभिक प्रयोग भी इसी जिले में हुए।
ललितपुर
ललितपुर में बड़े कार्यक्रम कम हुए, परंतु बातचीत लगातार चलती रही। इसी कारण से पोषण और बचत की छोटी-छोटी जीतें यहां बार-बार दिखीं।
हमीरपुर
स्वास्थ्य शिविरों से जुड़ाव और महिलाओं के छोटे काम-धंधे यहां की विशेष पहचान बने।
महोबा
स्कूल, समूह और समाज की बात सुनना, यहां तीनों एक साथ चलते हैं। इसी कारण से टिकाऊ नतीजे भी देखने को मिले।
बांदा
एक ही मंच पर महिला समूह और युवा मंडल का बैठना बांदा में रास आया। समूह की दृढ़ता और सेवाओं की सूचना, दोनों बढ़ीं।
चित्रकूट
शिक्षा, स्वास्थ्य की सूचना और गांव के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मेल, यही चित्रकूट में संस्था की अलग पहचान बनाता है।
जो अब भी नहीं बदला
तीस साल में बहुत कुछ बदला, पर गांव अब भी पलायन से जूझ रहा है। पानी का प्रश्न जहां का तहां खड़ा है। कई लड़कियों की पढ़ाई बारहवीं के बाद रुक जाती है। सरकारी योजनाओं का लाभ हर घर तक नहीं पहुंचा।
हम इस पेज पर जीत का ढोल नहीं बजाते। जहां संस्था पीछे रही, जहां काम बीच में छूट गया, जहां हम और बेहतर कर सकते थे, वह भी हमारा ही उत्तरदायित्व है। आगे की सोच इसी सच पर टिकी है।
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