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बरसों का लगातार साथ
असर · 1994 से आज तक
हम दावों से ज्यादा दृश्य पर यकीन रखते हैं। इस पेज पर गांव में जो बदला उसका ईमानदार हिसाब है, मील के पत्थर और सातों जिलों की अलग तस्वीरें भी।
एक नजर में
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बरसों का लगातार साथ
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बुन्देलखण्ड के जिले, यूपी और एमपी
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खंभों पर जुड़ा काम
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उरई से चलता अनुशासन
ये आंकड़े गौरव के लिए नहीं हैं। इनसे बस इतना समझा जा सकता है कि हम लंबे समय तक टिकने पर विश्वास रखते हैं। गिनती तब भी कम बताती है जब काम गहरा हो।
दिखने वाला बदलाव
छूटे बच्चे वापस कक्षा में, अभिभावकों का स्कूल तक आना, और परिवार में यह बात कि पढ़ाई खत्म कर देने से पहले सोचा जाए। छोटी बात दिखती है, असर बड़ा होता है।
समूह चलता रहा, तो बचत भी चली, और धीरे-धीरे बड़े फैसलों में महिला की राय पहुंचने लगी। यह पांच साल की बात नहीं है, यह दस-पंद्रह साल की बात है।
जिन परिवारों ने पहले शहर का अस्पताल नहीं देखा था, उन्होंने समय रहते मदद लेना शुरू किया। कागज और रास्ता, दोनों का डर घटा।
मील के पत्थर
उरई से बुन्देलखण्ड विकास सेवा आश्रम की औपचारिक शुरुआत। पहला ध्यान स्कूल जुड़ाव और परिवार संवाद पर।
छूटे बच्चों को पढ़ाई से वापस जोड़ने का ढांचा बना। बुन्देलखण्ड के और गांव जुड़े।
जालौन, हमीरपुर और बांदा में महिला स्वयं सहायता समूहों का जाल बिछा। बचत, छोटी उद्यमिता और बैंक खाता पहली बार।
स्वास्थ्य जागरूकता, पोषण, और किशोरी संवाद पर काम मजबूत हुआ। ललितपुर और चित्रकूट में नए गांव।
महामारी के वर्ष। फोन संवाद, घर तक पहुंच, राशन सहयोग और स्वास्थ्य की बुनियादी जानकारी पर पूरा जोर।
युवा भागीदारी, स्थानीय संवाद मंडल, और बुन्देली संस्कृति को काम का हिस्सा बनाने की नई कोशिशें।
सातों जिलों में चारों खंभे सक्रिय। पहले की तरह, कागज बाद में, गांव पहले।
जिलेवार तस्वीर
जालौन
जालौन में स्कूल जुड़ाव, महिला समूह और परिवार स्वास्थ्य पर लगातार काम। यहीं से संस्था के अनुशासन की शैली बनी।
झांसी
यहां पढ़ाई और स्वास्थ्य एक ही बातचीत में जुड़कर आए। युवा भागीदारी के शुरुआती प्रयोग भी इसी जिले में।
ललितपुर
ललितपुर में बड़ा कार्यक्रम कम, लेकिन निरंतर संवाद ज्यादा। इसी वजह से पोषण और बचत की छोटी जीतें यहां बार-बार दिखीं।
हमीरपुर
स्वास्थ्य शिविरों से जुड़ाव और महिलाओं के छोटे काम-धंधे यहां की खास पहचान रहे।
महोबा
स्कूल, समूह और समुदाय की सुनवाई यहां एक साथ चलती है। इसलिए टिकाऊ नतीजे देखने को मिले।
बांदा
एक मंच पर महिला समूह और युवा मंडल का बैठना बांदा में कारगर रहा। समूह की स्थिरता और सेवा जानकारी दोनों बढ़ीं।
चित्रकूट
शिक्षा, स्वास्थ्य जानकारी और स्थानीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मेल चित्रकूट में संस्था की अलग पहचान बनाता है।
जो अब भी नहीं बदला
तीस साल में बहुत कुछ बदला, पर गांव अब भी पलायन से जूझता है। पानी का सवाल खड़ा है। कई लड़कियों की पढ़ाई बारहवीं के बाद रुक जाती है। सरकारी योजना का लाभ हर घर तक नहीं पहुंचा।
हम इस पेज पर जीत का ढोल नहीं बजाते। जहां संस्था पिछड़ी है, जहां काम आधे में छूटा है, जहां हम बेहतर हो सकते थे, वह भी हमारी जिम्मेदारी है। आगे की सोच इसी स्वीकारोक्ति पर खड़ी है।
जुड़ना है
स्वयंसेवा, साझेदारी, अध्ययन, या समर्थन। जिस भी रूप में आप जुड़ना चाहें, संपर्क कीजिए।