+91 63948 44574 WhatsApp उरई · 1994 से

संस्थापक · दो पीढ़ियों का काम

संस्थापक

संस्था का आरंभ हमीरपुर जिले के गहरौली गांव में श्री रामगोपाल द्विवेदी और श्रीमती यशोदा द्विवेदी ने किया था। श्री रमेश चन्द्र द्विवेदी का जन्म भी गहरौली में हुआ। यही काम विरासत के रूप में उन्हें मिला। 6 फरवरी 1995 को अमर गंज चरखारी, जिला हमीरपुर (वर्तमान महोबा) से ‘बुन्देलखण्ड विकास सेवा आश्रम’ का सोसायटी के रूप में पंजीकरण हुआ। आगे चलकर संस्था और परिवार उरई में बस गए, और नवीनीकरण उरई, जिला जालौन से कराया गया है।

आरंभ · गहरौली, हमीरपुर

श्री रामगोपाल द्विवेदी और श्रीमती यशोदा द्विवेदी

इस सामाजिक काम का आरंभ श्री रमेश चन्द्र द्विवेदी के माता-पिता ने गहरौली से की थी। गहरौली हमीरपुर जिले की मौदहा तहसील का बड़ा गांव है, और बुन्देलखण्ड के सबसे बड़े गांवों में से एक माना जाता रहा है। 2011 की जनगणना में यहां की जनसंख्या लगभग 11,000 दर्ज है। यही गांव परिवार और संस्था के काम की जड़ है।

1980 के दशक में श्री रामगोपाल द्विवेदी परिवार सहित गहरौली से चरखारी (महोबा) आ गए। वे चरखारी के ब्लॉक/तहसील कार्यालय में वरिष्ठ लेखाकार के पद पर सेवारत रहे। इसी दौरान चरखारी और आस-पास के गांवों में परिवार का दूसरा पड़ाव बना।

यही काम आगे चलकर विरासत के रूप में श्री रमेश चन्द्र द्विवेदी को मिला। 6 फरवरी 1995 को परिवार के तत्कालीन पड़ाव अमर गंज चरखारी, जिला हमीरपुर (वर्तमान महोबा) से ‘बुन्देलखण्ड विकास सेवा आश्रम’ का सोसायटी के रूप में पंजीकरण हुआ। आगे चलकर संस्था और परिवार उरई में बस गए, जहां श्री रमेश चन्द्र द्विवेदी की श्रम विभाग की सेवा थी। संस्था का नवीनीकरण भी उरई, जिला जालौन से कराया गया है।

Sh. Ramesh Chandra Dwivedi, co-founder of Bundelkhand Vikas Seva Ashram

श्री रमेश चन्द्र द्विवेदी

सह-संस्थापक · संचालक

माता-पिता से मिली विरासत को 1994 में बुन्देलखण्ड विकास सेवा आश्रम के रूप में उरई से नई पहचान दी। उरई में रहकर 40 साल तक श्रम विभाग में सेवा दी और 2020 में वरिष्ठ श्रम प्रवर्तन अधिकारी (Senior Labour Enforcement Officer) पद से सेवानिवृत्त हुए। इसी कार्यकाल में बुन्देलखण्ड के विकास को निकट से देखा।

2005 में उरई से ‘योग क्रांति’ का आरंभ किया। बुन्देलखण्ड के जालौन-झांसी क्षेत्र में पतंजलि योगपीठ से मण्डल प्रभारी के रूप में लंबे समय तक जुड़े रहे।

14 अप्रैल 2025 को उरई में महर्षि वाग्भट्ट योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा संस्थान आरंभ किया। वे उसके संचालक हैं। सेवानिवृत्ति के बाद से संस्था का सारा काम पूरे समय वे ही देखते हैं, और उरई की कई स्थानीय पहलों में भी हाथ बंटाते हैं।

उनकी विधि सीधी है, गांव-गांव घूमना और लोगों से बात करना। यही उनसे संस्था को मिली सबसे पुरानी आदत है।

Smt. Kanti Dwivedi, co-founder of Bundelkhand Vikas Seva Ashram

श्रीमती कान्ति द्विवेदी

सह-संस्थापिका · अध्यक्ष

उनका जन्म मुहाना गांव में हुआ, जो नदी किनारे बसा है। बाद का सारा जीवन उरई में बीता है। पेशे से शिक्षिका रहीं और क्षेत्र के बच्चों की पढ़ाई और भलाई के लिए जो सहायता बन पड़ी, करती रहीं। उरई और आस-पास के क्षेत्रों से उनका गहरा लगाव है। यही क्षेत्र आज संस्था के काम का केंद्र भी हैं।

संस्था की सह-संस्थापिका और अध्यक्ष। महिलाओं और परिवारों के बीच संस्था का काम वे ही चलाती हैं।

उनकी विधि

उनसे सीखी चार बातें

गांव पहले सुनना है

किसी भी काम की योजना गांव में बैठकर बनती है, दफ्तर में नहीं। वे यह बात कहते नहीं, हर बार करके दिखाते हैं।

महिला को बीच में रखना

घर का असली समाचार अक्सर महिला के पास होता है। बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य, राशन और संबंध, सब पर उसी की दृष्टि रहती है। इसलिए काम का आरंभ भी वहीं से होता है।

दिखावा नहीं, निरंतरता

पोस्टर, आयोजन, तस्वीरें, इनसे कोई गांव नहीं बदलता। लगातार उपस्थिति बदलती है। वे चुपचाप, तीन दशक से, यहीं हैं।

संसाधन से बड़ी नीयत

पैसा कम हो तो काम रुक नहीं जाता। नीयत साफ हो तो कम साधनों में भी मार्ग निकल आता है। यह उनका पुराना विश्वास है।

प्रेरणा

उनके काम के चिह्न

विरासत

हम उनकी विरासत को कैसे आगे बढ़ाते हैं

पहले सुनना, फिर योजना

हर नए जिले, हर नए गांव में यही पहला पग होता है। यह आदत उन्हीं की दी हुई है, और हम आज भी इसे ईमानदारी से निभाते हैं।

महिला और परिवार, केंद्र में

समूह की बैठक हो या स्वास्थ्य शिविर, अपने काम का ढांचा हम आज भी महिला की भागीदारी के आसपास ही बनाते हैं।

संस्कृति और सम्मान

आल्हा, कजरी, राई जैसी लोक कलाएं केवल कार्यक्रम नहीं हैं, ये समाज में गहराई से बसी हैं। संस्था इन्हें पूरे सम्मान के साथ अपने काम का हिस्सा बनाती है।

सम्मान और पहचान

गांव में बनी पहचान

उनकी सबसे बड़ी पहचान किसी मंच या पुरस्कार में नहीं, उन गांवों में है जहां परिवार आज भी उन्हें याद करते हैं। यह किसी सर्टिफिकेट से नहीं मिलती।

काम की विधि पर स्थायी प्रभाव

अनुशासन, संवेदना, महिलाओं की भागीदारी और बिना दिखावे के काम, ये चार बातें आज भी संस्था की पहचान हैं। यही उनकी असली विरासत है।

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