कहानी · शिक्षा · बुन्देलखण्ड
स्कूल छूटने के बाद, वापस आने तक
कक्षा नौ में पढ़ाई रुक गई थी। वजह किताब नहीं थी। डर था। यह कहानी उसी डर को खोलती है, और यह बताती है कि एक गांव, एक परिवार और एक कार्यकर्ता मिलकर उसे कैसे धीरे-धीरे हटाते हैं।
जालौन के एक गांव की एक बच्ची। पिता खेत देखते हैं, मां घर। चार भाई-बहन। वो तीसरे नंबर की थी। छठीं तक कोई दिक्कत नहीं हुई। सातवीं में गणित आई, और गणित के साथ वो डर भी आया जिसे कोई बच्चा आसानी से किसी को नहीं बताता।
सवाल की कॉपी पर लाल निशान। कक्षा में जवाब न आने पर चुप्पी। फिर जिस दिन शिक्षक ने खड़ा किया और जवाब नहीं आया, तो गाल पर एक थप्पड़ नहीं पड़ा, लेकिन वो हंसी जो बाकी बच्चों ने दबाई, वो कान तक पहुंच गई। उस दिन के बाद स्कूल जाना एक बोझ बन गया।
वो बीमारी का बहाना बनाने लगी। एक दिन, दो दिन, एक हफ्ता। मां ने पहले गुस्सा किया, फिर चिंता की। पिता ने कहा, ठीक है, घर पर रह। खेत में मदद करा। बच्ची ने चुपचाप सिर हिलाया। उसके लिए खेत स्कूल से अच्छा नहीं था, पर उस थप्पड़ से बेहतर था जो उसे लगा ही नहीं था।
छूटना अचानक नहीं होता। यह धीरे-धीरे होता है। पहले एक दिन, फिर दो, फिर मन इतना कमजोर हो जाता है कि लौटना पहाड़ लगने लगता है। एक शिक्षा कार्यकर्ता, जालौन
पहला कदम, सुनना
संस्था की महिला कार्यकर्ता जब पहली बार उस घर पहुंची, तो उन्होंने सीधे बच्ची से बात नहीं की। दालान में बैठीं। मां से पूछा कि खाना क्या बना है। कुल बीस मिनट। फिर अगले हफ्ते फिर आईं। तीसरी बार बच्ची खुद दरवाजे तक आ गई। चौथी बार उन्होंने बच्ची के साथ एक कोने में बैठकर बस इतना पूछा, कौन सा सवाल अटका था।
यह पूछताछ की तरह नहीं था। यह ऐसे था जैसे कोई बड़ी बहन बहन को बता रही हो कि गणित से वो खुद भी डरती थी कभी। बच्ची की आंखें नम हुईं। पर ज़बान अब थोड़ी खुली। कार्यकर्ता ने कहा, हम साथ बैठेंगे। दो-दो सवाल। रोज नहीं, हफ्ते में तीन दिन।
दूसरा कदम, स्कूल से बात
स्कूल जाकर कार्यकर्ता ने शिक्षक से शिकायत नहीं की। सीधे कहा कि एक बच्ची कक्षा नौ तक आई है, अब उसे वापस जोड़ना है, और हमें यह जानना है कि कैसे दाखिला फिर हो। शिक्षक ने पन्ना निकाला, उपस्थिति देखी, बोले, डेढ़ महीना बचा है, इस सत्र में नाम कटेगा। हम अगले सत्र में सीधे दाखिला कराएंगे।
छह महीने के भीतर बच्ची फिर कक्षा में थी। गणित अब भी उतना आसान नहीं था, पर वो खड़े होने पर चुप नहीं रहती थी। गलत जवाब भी दिया, तो भी दिया। हंसी अब कान तक नहीं पहुंचती थी, क्योंकि अब खुद के भीतर की आवाज उससे बड़ी हो चुकी थी।
सबक
हम यहां छोड़ देते हैं। यह कहानी बारहवीं तक पहुंचने की गारंटी नहीं है। कभी-कभी बच्चा फिर भी नहीं लौटता। पर इस कहानी में एक बात साफ है। स्कूल से छूटने की वजह अक्सर कक्षा के अंदर होती है, और उसका इलाज भी कक्षा के बाहर, घर के दालान में बैठकर शुरू होता है।
हमारी पद्धति सीधी है। पहले सुनना, फिर स्कूल से बात, फिर छोटा साप्ताहिक साथ, और फिर उसकी अपनी हिम्मत। इनमें से कोई एक भी छूट जाए तो काम अधूरा है।
इस कहानी में बच्ची और परिवार की पहचान छिपाई गई है। यह बुन्देलखण्ड के कई परिवारों की साझी कहानी है, जो हमारी महिला कार्यकर्ताओं ने मिलकर सुनी और जी है।