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बुन्देलखण्ड · 22 जिले · उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश

बुन्देलखण्ड

बुन्देलखण्ड उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 22 जिलों में फैला हुआ क्षेत्र है। बेतवा, केन, धसान और यमुना के बीच। संस्था इसके यूपी वाले सात जिलों में सबसे गहरा काम करती है।

भूगोल

बाईस जिले, दो प्रदेश, नदियों से बंधा पूरा क्षेत्र

बुन्देलखण्ड यूपी और एमपी के 22 जिलों में फैला पुराना क्षेत्र है। यहां पहाड़ हैं, पथरीली भूमि है, कहीं-कहीं काली मिट्टी भी, और बरसात कम पर नदियां कई। संस्था की सबसे गहरी जड़ें यूपी के सात जिलों में हैं, पर पहचान और संबंध पूरे बुन्देलखण्ड से जुड़ा है।

केंद्रीय बुन्देलखण्ड · 14 जिले

यूपी और एमपी सरकार ने सात-सात जिले आधिकारिक रूप से बुन्देलखण्ड में गिने हैं।

विस्तारित सांस्कृतिक बुन्देलखण्ड · 8 जिले

आठ और जिले, जो भाषा, लोक संस्कृति और इतिहास के नाते बुन्देलखण्ड से जुड़े हैं और सांस्कृतिक बुन्देलखण्ड में गिने जाते हैं।

नोट: बुन्देलखण्ड की सीमाएं सरकारी कागज से अधिक संस्कृति और इतिहास से बनी हैं। सरकारी सूची 14 जिलों की है। बुन्देली भाषा, लोक परंपरा और पुराने संबंधों को जोड़ें तो यह गिनती 22 तक पहुंच जाती है।

स्थानीय बात: महोबा का चरखारी अपनी सात पुरानी झीलों और तालाबों के कारण ‘बुन्देलखण्ड का कश्मीर’ कहलाता है।

नदियां

बेतवा, केन, धसान, यमुना, और किनारों पर बसी जिंदगी

बेतवा पश्चिम से आती है, केन बांदा और चित्रकूट से गुजरती है, धसान बीच से निकलती है, और यमुना उत्तर की सीमा बनाती है। गर्मी में ये नदियां पतली पड़ जाती हैं, और बरसात में बड़ी हो जाती हैं। खेत, घर का पानी और गांव की बैठक, सब इन्हीं पर टिके हैं।

आवाज

आल्हा, कजरी, राई, सैरा, और बुन्देली भाषा का स्वाभिमानी स्वभाव

बारह बरस लौ कूकर जीएँ, अरु तेरह लौ जीएँ सियार।
बरस अठारह क्षत्री जीएँ, आगे जीवन कौ धिक्कार।।
जगनिक रचित आल्हाखण्ड की प्रसिद्ध पंक्तियां, बारहवीं सदी

आल्हा, लड़ाई का गीत

आल्हा केवल बहादुरी का गीत नहीं है। यह मिट्टी पर अधिकार और उत्तरदायित्व, दोनों की आवाज है। वयोवृद्ध आज भी गाते हैं, और जिन युवाओं ने सुना है, वे गांव को जल्दी नहीं भूलते।

कजरी, बरसात की आवाज

कजरी में वर्षा है, इंतजार है, वियोग है, और परिवार की हंसी भी है। महिलाओं की आवाज इसमें सबसे खुलकर निकलती है।

राई, थाप और पांव की बात

राई केवल नाच नहीं है। यह पूरे गांव के एक साथ होने का नजारा है, जहां बड़े और छोटे सब एक ही ताल पर होते हैं।

बुन्देली बोली

बुन्देली कोई नरम बोली नहीं है। इसके स्वाभिमान में संबंधों की गरमाहट भी है, और सच सीधे बोलने की आदत भी। गांव के बच्चे इसी बोली में सबसे अच्छा सुनते और समझते हैं।

कवि

बुन्देलखण्ड की मिट्टी ने कवि भी कम नहीं दिए

आल्हा लिखने वाले जगनिक से लेकर ओरछा के केशवदास, रसिकप्रिया वाले पद्माकर, और फाग के बेताज सम्राट ईसुरी तक, इस भूमि ने भाषा को बहुत कुछ दिया है। हर नाम आज भी बुन्देलखण्ड की भाषा, गीत और लेखन में जीवित है।

जगनिक / Jagnik

आल्हाखण्ड के रचयिता

बारहवीं सदी में महोबा के दरबार में जगनिक ने आल्हा और ऊदल की गाथा को शब्द दिए। यही गाथा आज भी बुन्देलखण्ड के गांवों में वयोवृद्धों की आवाज में सुनाई देती है।

केशवदास / Keshavdas

ओरछा के रीतिकालीन आचार्य

सोलहवीं और सत्रहवीं सदी के केशवदास ने रामचन्द्रिका और कविप्रिया लिखी। ओरछा के राज दरबार में लिखे गए इनके काव्य ने रीतिकाल को दिशा दी।

पद्माकर / Padmakar

रीतिकाल के रस-कवि

अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी के पद्माकर ने पद्माभरण, जगद्विनोद और हिम्मतबहादुर-विरदावली जैसे ग्रंथ लिखे। इनकी कविता में शृंगार, वीर और भक्ति तीनों एक साथ आते हैं।

ईसुरी / Isuri

फाग के बेताज सम्राट

टीकमगढ़ जिले के मेढ़की गांव के ईसुरी (1841 से 1909) को बुन्देलखण्ड का सबसे प्रिय लोक कवि माना जाता है। उनकी फाग आज भी फाल्गुन की रातों में गांव-गांव गाई जाती है।

जीवन

खेती, सूखा, पलायन, और फिर भी जड़ों से जुड़ाव

बुन्देलखण्ड की मुख्य खेती गेहूं, चना, मसूर, तिल और मूंगफली पर टिकी है। गर्मी में पानी कम, जाड़े में पाले का डर, और गर्मी से ठीक पहले की फसल पर परिवार का पूरा साल टिका रहता है। फसल खराब हो जाए तो मर्द शहर जाते हैं, और महिलाएं गांव का रोज का काम संभालती हैं।

यहां से लोग दिल्ली, कानपुर, मुंबई जाते हैं। पर होली, दीवाली और पंचमी पर लौटते भी हैं। यही जुड़ाव हमारे काम की असली नींव है। जालौन की एक गांव बैठक में सुनी हुई बात

त्यौहार और उत्सव

दिवारी, नौरता, ईद, होली, लोक और आस्था का एक ही कैलेण्डर

दिवारी

दिवाली के अगले दिन मर्द नाचते हैं। डंडा, थाप, आवाज, सब एक साथ। गांव में जोश और भाईचारा, दोनों एक ही दृष्टि में दिख जाते हैं।

नौरता

कुंवारी लड़कियों का त्यौहार। नौ दिन की रंगोली, लोकगीत और संदेशे। कजरी से पहले की तैयारी भी यहीं से आरंभ होती है।

होली और फाग

होली की रात फाग गाए जाते हैं। जात और उम्र की दूरियां इसी दिन सबसे कम होती हैं। संस्था के कार्यकर्ता जानते हैं कि इन दिनों बातचीत सबसे खुलकर होती है।

खान-पान

रसोई जो पानी और पत्थर दोनों संभालती है

बुन्देलखण्ड की थाली दिखावा नहीं करती। बाटी-चोखा, कढ़ी, अलौंची-कढ़ी, चने की दाल, मक्के और ज्वार की रोटियां, महुआ, तिल और गुड़ की मिठास। यह रसोई मौसम के साथ बदलती है, और वही खाती है जो भूमि दे सके।

इसलिए काम

यह भूमि समझे बिना हमारा कोई कार्यक्रम नहीं बनता

जब हम स्कूल से छूटे बच्चे की बात करते हैं, तो वह बात पलायन के दबाव से अलग नहीं रह जाती। जब हम महिलाओं की बचत पर काम करते हैं, तो वह सूखे और खेती की अनिश्चितता से जुड़ी है। जब हम युवाओं से बातचीत करते हैं, तो आल्हा, कजरी और बुन्देली की अपनी जगह बनती है।

इसी कारण से इस साइट पर एक पूरा पेज बुन्देलखण्ड के लिए है। अगर यह जगह नहीं समझ में आई, तो यहां का काम भी अधूरा ही दिखेगा।

संबंध है

बुन्देलखण्ड से कोई न कोई जुड़ाव हर हिंदुस्तानी से है

अगर यह जुड़ाव आपके पास है, परिवार का हो या सीखने का, तो हमें लिख दीजिए। हम सुनेंगे और साथ बैठेंगे।

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